- by Manish Kumar Susari
- 2026-02-16 15:44:37
स्वदेशी इनक्रेडिबल न्यूज़
शहर के अष्टभुजी कॉलोनी के द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल के सभा कक्ष में "साहित्य की जाति और धर्म" विषय पर एक साहित्यिक संगोष्ठी का उन्मेष परिवार और उपनिषद मिशन द्वारा आयोजन किया गया। सभा का प्रारंभ संजय पांडे के गीत "वीणावादिनी ज्ञान की देवी तू ज्ञान की ज्योति जगा देना" के साथ किया गया। सभा के अध्यक्ष कवि कामेश्वर द्विवेदी ने कविता पढ़कर अपनी बात कही, "उगता नित्य मनुज के अन्तर में अंकुर कटुता का/पथ के शूल हटाकर पग-पग फूल बिछाना होगा/जन-जन के उर अमर प्रेम का दीप जलाना होगा।" इस अवसर पर युवा कवि मनोज कुमार के पहले काव्य संग्रह "जिनके हम सब माली हैं" का लोकार्पण किया गया।
विषय प्रवर्तन करते हुए श्री रामनिवास सिंह जी ने कहा कि जाति और धर्म कभी उत्कृष्ट साहित्य पर हावी नहीं रहते। उन्होंने रसखान, तुलसीदास, प्रेमचंद का उदाहरण देते हुए कहा कि साहित्य ने जाति और धर्म की रुढियों पर प्रहार ही किया, उसका समर्थन नहीं किया है शोधार्थी कृष्णानंद मिश्रा जी ने इस विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि स्वार्थपरक लेखन साहित्य नहीं है। प्रोफेसर समरेंद्र नारायण मिश्र ने कहा कि साहित्य की केवल एक जाति और धर्म है और वह है लोकमंगल। मुख्य वक्ता डॉ निरंजन यादव ने कहा कि भोगा हुआ यथार्थ साहित्य के विषय हो सकते हैं। बदलते समय के साथ साहित्य के प्रतिमान बदलते हैं। रामनगीना कुशवाहा जी ने कहा कि एक बार में बिना किसी मोह के जाति और धर्म की संकीर्णताओं को भूल जाने की आवश्यकता है। माधव कृष्ण ने कहा कि, इस देश में दो विचारधाराओं पर जाति और धर्म को समाप्त करने की महती जिम्मेदारी थी, वामपंथ और अध्यात्म। लेकिन दोनों के साहित्य जमीन पर आते ही नासमझों के कारण अलग अलग रूपों में वर्ग संघर्ष और जातीय भेदभाव को जन्म देते गए। वही लिखें, पढ़ें और बोलें जिससे सबका हित हो, न कि विक्टिमाइजेशन कार्ड खेलकर समाज में घृणा फैलाएं।
इस अवसर पर साहित्य की जाति और धर्म प्रेम बताए हुए युवा कवि रमाकांत राही ने ",इस नफरत के अंगार में भी श्रंगार ही लिखते जाएंगे/हम दीवाने हैं दीवानों के प्यार ही लिखते जाएंगे" पढ़कर सभी की तालियां बटोरीं। प्रसिद्ध गीतकार रश्मि शाक्य ने गीत गाकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया, "हमने जिसे मोती दिए सागर खंगालकर/दामन हमारा रख दिया वही ज़वाल कर/दुनिया की भीड़ में कोई पहचान बनाई/जिसने हमारे नाम का सिक्का उछालकर।" पूजा राय ने इस विषय पर केंद्रित कविता सुनाकर लोगों को तालियां बजाने पर विवश कर दिया, "तुम रो लेना धर्म जाति जमीन के लिए/मैं रो लूंगी धरती पानी और तितली के टूटे हुए पंख के लिए।" वरिष्ठ कवि हरिशंकर पांडेय जी ने यह गीत गाकर लोगों को सोचने पर विवश कर दिया, "आवते पतोहिया/चली गइली विदेशवा सखी हो/बूढ़ा बुढ़ी झनखत बाड़े/बइठ के दुरियां राम/घूमि घूमि कहें सबसे/बचवा विदेश रहे /कन्हियों न दीहें ऊ त/अंतिम समईया राम।" रामअवध कुशवाहा जी ने अपनी व्यंग्यात्मक कविता "मुझे माफ़ करना ओ चमचे! ओ प्याले!"पढ़ी। मनोज कुमार जी ने अपनी कविता "बच्चा अब बड़ा हो गया है", सुनाकर सभी से परिपक्वता की आशा की। वीररस के कवि दिनेश चंद्र शर्मा जी ने पढ़ा, "आपस के मसले बाद में देख लेंगे/पहले डूबती कश्ती को संभालो यारों।"
इस अवसर पर डॉ सुभाष यादव, डॉ शिव यदुवंशी, बृजेंद्र यादव, अनिल राय इत्यादि उपस्थित थे।
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Er. Shakti Shankar Singh (Chief Editor)