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शहर के द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल अष्टभुजी कॉलोनी के सभागार में उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद, नवगीतकार डॉ उमाशंकर तिवारी और संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती पर एक संक्षिप्त गोष्ठी का आयोजन हुआ। संगोष्ठी का विषय था, आदर्श और व्यवहार का अन्तराल।

इस खबर के स्पोंसर है सॉफ्टनिक इंडिया, शाही मार्केट, गोलघर, गोरखपुर


ग़ाज़ीपुर। शहर के द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल अष्टभुजी कॉलोनी के सभागार में उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद, नवगीतकार डॉ उमाशंकर तिवारी और संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती पर एक संक्षिप्त गोष्ठी का आयोजन हुआ। संगोष्ठी का विषय था, आदर्श और व्यवहार का अन्तराल।

मुख्य वक्ता अर्थशास्त्री प्रोफेसर श्रीकांत पाण्डेय ने कहा कि, साहित्यकारों ने हमेशा आदर्श का चित्रण किया है लेकिन मानव स्वभाव यथार्थ में लोभी है। साहित्यकारों ने यथार्थ और भौंडे यथार्थ के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करने में अपनी कला दिखाई है। उनके सामने रामराज्य का एक बड़ा आदर्श तो है लेकिन धरातल पर मनुष्य की छोटी छोटी समस्याओं, शोषण, भेदभाव का यथार्थ भी है। कालजई रचनाकारों का पूरा प्रयास शोषण में आकंठ छटपटा रही जनता और शोषकों को आदर्श तक जाने का रहता है। 

विशिष्ट वक्ता समाजसेवी अखिलेश्वर प्रसाद सिंह जी ने कहा कि, सत्ता तक पहुंचने के लिए यथार्थ को कुरेदकर घाव को हरा रखने का प्रयास किया जाता है। साहित्यकार उस घाव पर मलहम लगाने के लिए अपनी कला का प्रयोग करता है और उस तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। उन्होंने अपने पिता भूतपूर्व विधायक सिद्धेश्वर प्रसाद सिंह जी का संदर्भ भी उठाया कि कैसे मूल्यपरक राजनीति के लिए उन्होंने विधायकी छोड़कर समाजवाद को पकड़ा

प्रोफेसर शिखा तिवारी ने कहा कि, तुलसी ने अपने समय के भारत वर्ष के सबसे बड़े झगड़े को ख़त्म कर दिया है। यानी शैव-वैष्णव धर्म का मिलन करा कर तुलसीदास ने संपूर्ण भारत को एक कर दिया। भारतवर्ष के दो सबसे बड़े देवताओं शिव और राम में ऐसी अखंडता कि कोई शिव को चाहने वाला राम से द्रोह नहीं कर पाता। तुलसीदास ने राम को सर्वत्र ईश्वर के रुप में प्रस्तुत किया है ,लेकिन उन्होंने कहीं भी राम के मुख से देवताओं की प्रशंसा नहीं करवायी, बल्कि मनुष्य योनी या इस मानव तन की महत्वत्ता को राम के मुख से इतने सुंदर तरीके से कहवा दिया है कि क्या कहें! 

 राम कहते हैं कि 'बड़े भाग्य से यह मनुष्य शरीर मिला है। सब ग्रंथों ने यही कहा है कि यह शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है।

माधव कृष्ण ने सभा का संचालन करते हुए कहा कि, गाज़ीपुर में नवगीत की प्रतिष्ठा करने वाले आलोचक और कवि डॉ उमाशंकर तिवारी पर अधिक शोध की आवश्यकता है। इस दिशा में कार्य तो हुए हैं लेकिन अभी भी हिंदी विभाग में कार्य करने वाले बहुतायत विद्वानों को नहीं पता है कि नवगीत के मानक हैं, टूल्स है और आलोचनाएं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।

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Er. Shakti Shankar Singh (Chief Editor)

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