- by Manish Kumar Susari
- 2026-02-16 15:44:37
स्वदेशी इनक्रेडिबल न्यूज़
अखाड़ा जुलूस निकालते मुस्लिम समाज के लोग।
जमानियां। मोहर्रम की पहली तारीख पर करतब दिखाते अखाड़ा जुलूस निकाला गया। जुलूस में बच्चे-बूढ़े और जवान शामिल रहे। मोहर्रम के अवसर पर मुस्लिम समाज के लोगों ने कर्बला के मैदान में हुई जंग में हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद किया। अखाड़ा जुलूस कस्बा बाजार से होते हुए। सैयद बाड़ा चौक पहुंचकर संपन्न हुआ। इस दौरान जुलूस में अखाड़े आकर्षण का केंद्र बने रहा। अखाड़े के कलाकारों ने हैरतअंगेज करतब दिखाए। इस दौरान अखाड़ा जुलूस का लोगों ने इस्तेख़बाल किया।
मोहर्रम के जुलूसों में सुरक्षा की दृष्टि से पुख्ता इंतजाम रहा। नगर पालिका परिषद के द्वारा साफ सफाई, चुने का छिड़काव कराया। इसके साथ ही पेयजल व्यवस्था को भी दुरुस्त रखा। मोहर्रम पर्व को लेकर नेसार अहमद खान वारसी, आरिफ खान वारसी, हयातुल्ला खान वारसी, दानिश मंसूरी, शाहिद जमाल मंसूरी सहित आदि लोगों ने बताया कि अकीदतमंदों ने जुम्मे के रोज शाम के वक्त से फातेहा का सिलसिला शुरू हुआ। इस दौरान उन्होंने बताया कि अगरबत्ती, मोमबत्ती, व दीप जलाकर आसपास में रौशनी किया। यह सिलसिला पूरे मोहर्रम के 10 दिनों तक चलता रहता है। सभी इमाम चौक पर महिलाएं बच्चे, बच्चियां और नन्हे मुन्ने बच्चे काफी संख्या में पहुंचते है। उन्होंने कहा कि इराक में इमाम हुसैन का रोजा ए मुबारक दरगाह है। जिसकी हूबहू (कापी) शक्ल में बनाई जाती है। जिसे ताजिया कहा जाता है। नेसार अहमद खान वारसी ने बताया कि भारत के तत्कालीन बादशाह तैमूर लंग ने मोहर्रम के महीने इमाम हुसैन के रोजे दरगाह की तरह बनवाया। जिसे ताजिया का नाम दिया गया। जो बेहद अहम है। मोहर्रम माह के 10 वें दिन यानी 10 तारीख को रोजा ए आशुरा कहा जाता है। खान ने बताया कि इसी दिन हजरत इमाम हुसैन की शहादत हुई थी। उन्होंने बताया कि इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मोहम्मद साहब छोटे नवासे हजरत इमाम हुसैन ने कर्बला में अपने 72 साथियों के साथ शहादत दी थी। और ऐसी मोहर्रम महे गम के महीने के तौर पर मनाया जाता है। और युवाओं द्वारा खेल का प्रदर्शन करने के लिए अभ्यास करते है। जिसमें बनेठी, ढाल, लाठी, डंडा का संचालन लगभग 50 साल पुरानी परंपरा चली आ रही है। इसमें हिन्दू भाई बढ़चढ़ का हिस्सा लेते है।
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Er. Shakti Shankar Singh (Chief Editor)