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प्रेमचंद और डॉ. उमाशंकर तिवारी की साहित्यिक विरासत पर हुआ मंथन, भव्य काव्य-गोष्ठी में गूंजी रचनाओं की स्वर-लहरियां

इस खबर के स्पोंसर है सॉफ्टनिक इंडिया, शाही मार्केट, गोलघर, गोरखपुर


अखिल भारतीय साहित्य परिषद, गाजीपुर इकाई के तत्वावधान में ग्राम खालिसपुर में कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती, नवगीतकार डॉ. उमाशंकर तिवारी की जयंती एवं भव्य काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया। साहित्य, संस्कृति और संवेदना के इस आयोजन में साहित्यकारों ने दोनों रचनाकारों के साहित्यिक योगदान और उनकी प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का संयोजन परिषद के गाजीपुर इकाई प्रमुख एवं सुविख्यात कवि हरिशंकर पाण्डेय ने किया। अध्यक्षता वरिष्ठ महाकवि कामेश्वर द्विवेदी ने की, जबकि मंच संचालन सुप्रसिद्ध नवगीतकार डॉ. अक्षय पाण्डेय ने किया। दीप प्रज्वलन तथा प्रेमचंद एवं डॉ. उमाशंकर तिवारी के चित्रों पर माल्यार्पण के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।
स्वागत वक्तव्य में हरिशंकर पाण्डेय ने कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य को समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा से जोड़ा और उसे सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। वहीं डॉ. उमाशंकर तिवारी ने नवगीत को लोकजीवन, भारतीय सांस्कृतिक चेतना और समकालीन यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की।
डॉ. उमाशंकर तिवारी के सुपुत्र डॉ. संतोष कुमार तिवारी ने अपने पिता को स्मरण करते हुए कहा कि उनका जीवन साहित्य के प्रति निष्ठा, सादगी और मूल्यबोध का प्रतीक था। उनके नवगीतों में भारतीय ग्राम्य जीवन, लोक-संस्कृति, मानवीय करुणा और समय की बेचैनी का प्रभावी चित्रण मिलता है।
डॉ. अक्षय पाण्डेय ने कहा कि प्रेमचंद ने भारतीय समाज को उसकी वास्तविक आकृति में देखने की दृष्टि दी, जबकि डॉ. उमाशंकर तिवारी ने नवगीत को परंपरा और आधुनिकता के बीच सशक्त सेतु बनाया। उन्होंने कहा कि साहित्य को केवल पढ़ना ही नहीं, बल्कि उसे सामाजिक आचरण का हिस्सा बनाना भी आवश्यक है।
कवि गोपाल 'गौरव' ने प्रेमचंद के साहित्य को भारतीय जनजीवन का महाकाव्य बताते हुए कहा कि उन्होंने किसान, मजदूर, स्त्री और उपेक्षित वर्गों को साहित्य में सम्मानजनक स्थान दिया। युवा कवि मनोज यादव 'बेफिक्र' ने कहा कि साहित्य का सबसे बड़ा दायित्व मनुष्य में मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखना है। वरिष्ठ कवि रामदेव पाण्डेय ने कहा कि साहित्यकार समाज के विवेक को जागृत रखने का दायित्व निभाता है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में महाकवि कामेश्वर द्विवेदी ने प्रेमचंद को भारतीय साहित्य की नैतिक चेतना का शिखर पुरुष बताते हुए कहा कि उनका साहित्य समय बदलने के बावजूद प्रासंगिक बना हुआ है। उन्होंने डॉ. उमाशंकर तिवारी के नवगीतों में भाषा-सौंदर्य, विचार की गहराई और लोकजीवन की ऊष्मा के समन्वय को रेखांकित किया।
विचार-गोष्ठी के बाद आयोजित काव्य-पाठ में कामेश्वर द्विवेदी, हरिशंकर पाण्डेय, डॉ. अक्षय पाण्डेय, डॉ. संतोष कुमार तिवारी, गोपाल 'गौरव', मनोज यादव 'बेफिक्र' और रामदेव पाण्डेय सहित अन्य कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। गीत, नवगीत, गजल, मुक्तक और समकालीन कविता की विविध प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को देर तक बांधे रखा। रचनाओं पर श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट से कवियों का उत्साहवर्धन किया।
कार्यक्रम में राजेन्द्र पाण्डेय, रविशंकर पाण्डेय, नंदकिशोर सिंह, कृष्णानंद पाण्डेय, जितेन्द्र यादव, सतीश सिंह, संजय सिंह, शशिकांत पाण्डेय, बब्लू यादव, राजकुमार गुप्ता सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी एवं क्षेत्र के गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।
अंत में राजनारायण पाण्डेय ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों, कवियों, श्रोताओं एवं आयोजन में सहयोग करने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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Er. Shakti Shankar Singh (Chief Editor)

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