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गोरखपुर में पत्रकारिता का नया ट्रेंड—फूल-माला पहनाइए, खबर मुफ्त में पाइए!

इस खबर के स्पोंसर है सॉफ्टनिक इंडिया, शाही मार्केट, गोलघर, गोरखपुर


पत्रकार को बुलाकर खबर की उम्मीद रखने से पहले, उसकी मेहनत का सम्मान करना सीखिए। — इ. शक्ति शंकर


गोरखपुर। बदलते दौर में पत्रकारिता का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। खबरों की तलाश में दिन-रात दौड़ने वाले पत्रकारों के सामने आज एक अलग तरह की चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। कार्यक्रम चाहे छोटा हो या बड़ा, आयोजकों को अपने आयोजन की खबर दूर-दूर तक पहुंचाने के लिए पत्रकार जरूर चाहिए, लेकिन जब पत्रकारिता के लिए सहयोग की बात आती है तो अक्सर वही पत्रकार नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।

पत्रकारों को कार्यक्रमों में बुलाकर मंच पर फूल-माला पहनाई जाती है, सम्मान-पत्र दिए जाते हैं और तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं। पत्रकारों का सम्मान निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल फूल-माला पहनाकर पत्रकार की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है?

एक पत्रकार के लिए सम्मान सिर्फ मंच पर माला पहनने का नाम नहीं है। उसकी असली पहचान उसकी खबर, उसकी निष्पक्षता, उसकी मेहनत और उसकी कलम से होती है। वह धूप, बारिश और विपरीत परिस्थितियों के बीच घटनास्थल तक पहुंचता है, जानकारी जुटाता है, खबर तैयार करता है और उसे समाज तक पहुंचाता है।

विडंबना यह है कि आज पान की छोटी दुकान से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक, छोटे घरेलू कार्यक्रम से लेकर बड़े सामाजिक आयोजनों तक पत्रकारों को बुलाया जाता है। उम्मीद होती है कि पत्रकार आयोजन की खबर प्रकाशित कर उसे लोगों तक पहुंचाएगा। लेकिन जब उसी पत्रकार को अपने संस्थान के लिए विज्ञापन या सहयोग की जरूरत होती है तो कई बार उसका फोन तक उठाना मुश्किल हो जाता है।

पत्रकारिता कोई ऐसा काम नहीं है जिसमें हर महीने निश्चित वेतन की गारंटी हो। बहुत से पत्रकार अपनी आय के लिए विज्ञापन और अन्य वैध आर्थिक सहयोग पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में उनकी मेहनत को केवल 100-200 रुपये में आंकना न सिर्फ उनकी मेहनत को छोटा करना है, बल्कि पत्रकारिता के पेशे का भी अपमान है।

आज अलग-अलग समूह बनाकर खबरों और माइक की संख्या के हिसाब से आर्थिक गणना करने का चलन भी दिखाई देता है। समूह बनाना गलत नहीं है, यदि उससे जुड़े पत्रकारों और उनके संस्थानों को वास्तविक लाभ मिले। समस्या तब पैदा होती है जब पत्रकार को सिर्फ संख्या या सस्ते प्रचार के माध्यम के रूप में देखा जाने लगे।


*पत्रकार किसी आयोजन की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं, समाज को सच दिखाने के लिए वहां पहुंचता है।*


आयोजकों से यही आग्रह है कि पत्रकारों का सम्मान जरूर करें, लेकिन केवल दिखावे के लिए नहीं। यदि पत्रकार आपके कार्यक्रम को अपना समय देता है, आपकी खबर तैयार करता है और उसे समाज तक पहुंचाता है तो उसकी मेहनत की भी कद्र कीजिए।

फूल-माला कुछ समय बाद मुरझा जाती है, सम्मान-पत्र अलमारी में रख दिया जाता है, लेकिन पत्रकार की मेहनत से निकली खबर हजारों लोगों तक पहुंचती है।

इसलिए पत्रकार को फूल-माला से ज्यादा उसकी मेहनत का सम्मान चाहिए।

क्योंकि पत्रकार कोई निम्न वर्ग का व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था के बीच संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम है।

Support India to emerge as a knowledge society by identifying and nurturing the inner strength of youth and rural people, so that India can be transformed into a developed nation..

Er. Shakti Shankar Singh (Chief Editor)

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